शिव तांडव स्तोत्र: अर्थ सहित पूर्ण पाठ | Shiv Tandav Stotram in Hindi

शिव तांडव स्तोत्र: अर्थ सहित पूर्ण पाठ |

शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव की महिमा का एक अत्यंत शक्तिशाली और काव्यमय स्तुति-ग्रंथ है, जिसे लंका के राजा रावण ने रचा था। पुराणों के अनुसार, रावण भगवान शिव का परम भक्त था और उसने कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास किया। तब भगवान शिव ने अपने अंगूठे से पर्वत को दबा दिया, जिससे रावण का हाथ उसके नीचे फँस गया। अत्यंत पीड़ा में भी रावण ने शिव की स्तुति में यह तांडव स्तोत्र गाया। उसकी भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे मुक्त किया और वरदान प्रदान किया। यह स्तोत्र शिव के उग्र, नृत्यमय और ब्रह्मांडीय स्वरूप का अद्भुत वर्णन करता है। इसकी ध्वनि, लय और शब्दों की गति स्वयं शिव के तांडव नृत्य की ऊर्जा का अनुभव कराती है, इसलिए इसे भक्ति और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

शिव तांडव स्तोत्र का सरल भावार्थ

इस स्तोत्र में भगवान शिव के दिव्य, उग्र और करुणामय स्वरूप का वर्णन किया गया है। उनकी जटाओं से बहती गंगा, गले में लिपटे नाग, और डमरू की गूंजती ध्वनि उनके तांडव नृत्य की महिमा को दर्शाती है। यह तांडव सृष्टि की गति, परिवर्तन और संतुलन का प्रतीक है।

शिव के मस्तक पर जलती अग्नि और अर्धचंद्र उनके अद्वितीय रूप को प्रकट करते हैं। वे कामदेव का दहन करने वाले, त्रिपुर का विनाश करने वाले और संसार के बंधनों को काटने वाले हैं। उनके लिए मित्र-शत्रु, सोना-मिट्टी, राजा-प्रजा सभी समान हैं, क्योंकि वे समभाव और वैराग्य के प्रतीक हैं।

इस स्तोत्र में शिव को ऐसे ईश्वर के रूप में दर्शाया गया है जो विनाश के साथ-साथ कल्याण के भी देवता हैं। उनका तांडव केवल संहार नहीं, बल्कि नई सृष्टि की शुरुआत का संकेत है। वे भक्तों की कठिनाइयों को दूर कर उन्हें आंतरिक शांति, शक्ति और मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं।

जो व्यक्ति इस स्तोत्र का नित्य स्मरण और पाठ करता है, उसका मन शुद्ध होता है और उसमें भगवान शिव के प्रति गहरी भक्ति जागृत होती है। शिव का चिंतन जीवन के भ्रम, भय और दुख को दूर कर आत्मिक शांति प्रदान करता है।

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