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माँ स्कंदमाता: शिव पुराण में कार्तिकेय जन्म की कथा, विशुद्ध चक्र और पूजा विधि

mata skandmata
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जय माता दी! 🙏

नवरात्रि का पांचवां दिन ‘मातृत्व’ (Motherhood) और ‘शौर्य’ (Valor) के उस सर्वोच्च शिखर का प्रतीक है, जहाँ एक माँ केवल ममता की मूरत नहीं रहती, बल्कि ब्रह्मांड के सबसे महान सेनापति का निर्माण करने वाली ‘प्रथम गुरु’ बन जाती है। आज हम आदिशक्ति के उस स्वरूप की उपासना करते हैं, जिसने धर्म की रक्षा के लिए भगवान कार्तिकेय (स्कंद) को अस्त्र-शस्त्र और ब्रह्मज्ञान की शिक्षा दी।

सनातन परंपरा में माँ स्कंदमाता का यह स्वरूप आज के समाज के लिए सबसे बड़ा संदेश है—एक माँ का असली कर्तव्य अपने बच्चे को केवल सुख-सुविधाएं देना नहीं, बल्कि उसे ऐसा अजेय योद्धा बनाना है जो जीवन के हर ‘तारकासुर’ (अधर्म और चुनौतियों) का सिर कुचल सके। आइए, पंडितवर्स के इस विशेष अंक में माँ स्कंदमाता के प्रामाणिक इतिहास और विशुद्ध चक्र के योग-रहस्य को गहराई से समझें।

‘स्कंदमाता’: नाम की उत्पत्ति और ब्रह्मांडीय स्वरूप

भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र ‘कार्तिकेय’ को देव-सेनापति होने के कारण शास्त्रों में ‘स्कंद’ (Skanda) कहा गया है। अपनी इसी असीम शक्तिशाली संतान की माता होने के कारण देवी के पांचवें स्वरूप को ‘स्कंदमाता’ नाम प्राप्त हुआ।

दिव्य स्वरूप दर्शन:

पौराणिक महागाथा: तारकासुर का अहंकार और शिव-तेज से सेनापति का जन्म

शिव महापुराण (रुद्र संहिता – कुमार खण्ड) में भगवान स्कंद के जन्म की जो कथा है, वह अपने आप में एक अद्भुत ब्रह्मांडीय घटना (Cosmic Phenomenon) है।

माता सती के आत्मदाह के पश्चात भगवान शिव वैराग्य धारण कर घोर समाधि में लीन हो गए। दूसरी ओर, ‘तारकासुर’ नामक एक क्रूर और चालाक असुर ने ब्रह्मा जी की तपस्या कर यह वरदान मांग लिया कि उसकी मृत्यु केवल ‘शिव के पुत्र’ के हाथों ही हो। उसे लगा कि वैरागी शिव अब कभी विवाह नहीं करेंगे और वह अमर हो गया है। उसने स्वर्ग पर कब्ज़ा कर लिया और देवताओं को बंदी बना लिया।

सृष्टि को बचाने के लिए माता पार्वती ने कठोर तप किया और शिव जी को समाधि से जाग्रत कर उनसे विवाह किया। शिव और शक्ति के मिलन से जो परम तेज (दिव्य ऊर्जा का बीज) उत्पन्न हुआ, उसका ताप इतना भयंकर था कि संपूर्ण ब्रह्मांड उसे सहन नहीं कर सका।

अग्नि, गंगा और कृत्तिकाओं का योगदान:

उस शिव-तेज को सबसे पहले अग्नि देव ने धारण किया, लेकिन वे भी उस ताप को सह नहीं पाए। फिर वह तेज माता गंगा को सौंपा गया। गंगा की लहरों ने उस दिव्य ऊर्जा को ‘शरवण’ (सरकंडों के एक विशेष वन) में स्थापित कर दिया। उसी शरवण वन में, शिव और शक्ति की उस सम्मिलित ऊर्जा से छह मुखों वाले एक अत्यंत तेजस्वी बालक का जन्म हुआ।

आकाशगंगा की छह अप्सराओं (कृत्तिकाओं) ने उस बालक को दूध पिलाकर पाला, जिसके कारण उनका नाम ‘कार्तिकेय’ पड़ा। जब यह बालक माता पार्वती को सौंपा गया, तब उन्होंने ‘स्कंदमाता’ का रूप धारण किया और अपने पुत्र को ब्रह्मांड के सभी अस्त्र-शस्त्र, वेद और युद्ध नीतियां सिखाईं। इन्हीं भगवान स्कंद ने बाद में देवताओं की विशाल सेना का नेतृत्व किया और तारकासुर का वध करके तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त कराया।

योग शास्त्र: ‘विशुद्ध चक्र’ (Throat Chakra) का रहस्य और वाक् सिद्धि

नवरात्रि का पांचवां दिन उन योग साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो ‘वाक् सिद्धि’ (बोले गए शब्दों का सत्य हो जाना) और सत्य के मार्ग पर चलना चाहते हैं। आज का दिन ‘विशुद्ध चक्र’ के जागरण का है।

स्थान और महत्व: यह चक्र हमारे कंठ (Throat) के ठीक पीछे रीढ़ की हड्डी में स्थित होता है। यह 16 पंखुड़ियों वाले कमल के समान है।

पंचम नवरात्रि पूजा विधान: वेदोक्त नियम और महाभोग

1. सात्विक शुभ रंग (The Color of Supreme Knowledge)

आज के दिन पीले (Yellow), सुनहरे (Golden) या हल्के नीले रंग के वस्त्र धारण करना चाहिए। पीला रंग गुरु (बृहस्पति), ज्ञान, सात्विकता और आध्यात्मिक ऊर्जा का सर्वोच्च प्रतीक है। भगवान स्कंद (कार्तिकेय) और माँ स्कंदमाता दोनों को ही पीला रंग अत्यंत प्रिय है।

2. प्रिय पुष्प (Sacred Offerings)

माँ की पूजा में पीले गुलाब, पीले कमल या चंपा के फूलों का प्रयोग करें। पूजा करते समय भगवान कार्तिकेय (बाल रूप) का ध्यान अवश्य करें, क्योंकि माँ की पूजा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक उनके पुत्र को स्मरण न किया जाए।

3. वेदोक्त महाभोग (केले का प्रसाद)

आज के दिन माँ स्कंदमाता को केले (Banana) का भोग लगाना सबसे शुभ माना गया है।
आयुर्वेदिक और सनातनी दृष्टिकोण: चैत्र माह (Spring season) में शरीर का तापमान बढ़ने लगता है। केला शरीर को प्राकृतिक इलेक्ट्रोलाइट्स (Potassium) और शीतलता प्रदान करता है। इस सात्विक फल का भोग लगाकर प्रसाद रूप में ग्रहण करने से शारीरिक व्याधियां (बीमारियां) दूर होती हैं और साधक का स्वास्थ्य उत्तम रहता है।

सिद्ध ध्यान मंत्र और नवदुर्गा स्तुति

माँ की आराधना करते समय रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें, अपना ध्यान कंठ (गले) पर केंद्रित करें और इस सिद्ध मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करें:

माँ स्कंदमाता का ध्यान मंत्र:

सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चित करद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

(सरल अर्थ: जो माता नित्य सिंहासन (और कमल) पर विराजमान हैं, जिनके दोनों हाथों में कमल के फूल सुशोभित हैं, वे यशस्विनी माँ स्कंदमाता हमारे लिए सदा कल्याणकारी हों।)

नवदुर्गा स्तोत्र (प्रार्थना मंत्र):

या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

आज की पीढ़ी के लिए माँ स्कंदमाता का संदेश

सनातन परंपरा कभी भी हमें कमज़ोर या पलायनवादी नहीं बनाती। माँ स्कंदमाता हमें याद दिलाती हैं कि मातृत्व (Motherhood) केवल बच्चे की ज़िद पूरी करने का नाम नहीं है। एक माता का सर्वोच्च कर्तव्य है अपने भीतर छुपी हुई ‘शक्ति’ को पहचानना और अपनी संतान को ऐसा संस्कार और ज्ञान देना, जिससे वह समाज में फैले हुए अधर्म और नकारात्मकता (तारकासुर) का डटकर मुकाबला कर सके।

जब हम अपनी सनातन जड़ों से जुड़ते हैं, तभी हम अपने भीतर बैठे उस अजेय ‘स्कंद’ को जाग्रत कर पाते हैं।

जय माँ स्कंदमाता! धर्मो रक्षति रक्षितः! 🚩


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