श्रीमद्भगवद्गीता: अध्याय १५ (पुरुषोत्तम योग) – एक परिचय
श्रीमद्भगवद्गीता का पंद्रहवाँ अध्याय ‘पुरुषोत्तम योग’ के नाम से जाना जाता है। मात्र २० श्लोकों वाले इस छोटे से अध्याय में सम्पूर्ण वेदों और वेदांत का गहरा सार समाहित है। विशेषकर अधिक मास (जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है) में इस अध्याय के पाठ का अत्यधिक महत्व और पुण्य माना गया है।
इस अध्याय के आरंभ में भगवान श्रीकृष्ण ने इस भौतिक संसार की तुलना एक उल्टे पीपल के पेड़ (अश्वत्थ वृक्ष) से की है। इस विचित्र पेड़ की जड़ें ऊपर (परमेश्वर की ओर) हैं और शाखाएं नीचे (संसार की ओर) फैली हुई हैं। भगवान अर्जुन को समझाते हैं कि मनुष्य को वैराग्य (अनासक्ति) रूपी मजबूत कुल्हाड़ी से इस मोह रूपी पेड़ की जड़ों को काट देना चाहिए, तभी वह इस जन्म-मृत्यु के अंतहीन चक्र से मुक्त हो सकता है।
इसके साथ ही, भगवान ने अस्तित्व को दो भागों में बांटा है— ‘क्षर’ (नाशवान शरीर और भौतिक जगत) तथा ‘अक्षर’ (अविनाशी जीवात्मा)। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को इन दोनों से श्रेष्ठ और परे बताते हैं, इसीलिए वे तीनों लोकों और वेदों में ‘पुरुषोत्तम’ (सर्वोच्च सत्ता) कहलाते हैं। जो भी ज्ञानी मनुष्य बिना किसी संदेह के इस परम सत्य को जान लेता है, उसके जीवन के सभी क्लेश मिट जाते हैं और वह पूर्ण रूप से परमात्मा की भक्ति में लीन होकर परमधाम को प्राप्त कर लेता है।
|| अथ पञ्चदशोध्यायः ||
|| श्री भगवानुवाच ||
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३ ॥
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४ ॥
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ६ ॥
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ ८ ॥
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९ ॥
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११ ॥
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेब चाहम् ॥ १५ ॥
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ १९ ॥
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ २० ॥
भावार्थ (१): भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं – इस संसार को एक ऐसे पीपल के पेड़ की तरह समझो जिसकी जड़ें ऊपर (परमात्मा) की ओर हैं और शाखाएं नीचे (सृष्टि) की ओर हैं। वेद इस पेड़ के पत्ते हैं। जो इस अविनाशी संसार रूपी वृक्ष के रहस्य को समझ लेता है, असल में वही वेदों का सच्चा ज्ञाता है।
भावार्थ (२): इस पेड़ की शाखाएं तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) के कारण ऊपर और नीचे फैली हुई हैं। सांसारिक विषय-भोग ही इसकी कोपलें हैं। इस पेड़ की कुछ जड़ें नीचे मनुष्य लोक तक भी गई हैं, जो इंसानों को उनके कर्मों के बंधन में जकड़े रखती हैं।
भावार्थ (३ व ४): इस संसार रूपी पेड़ का असली रूप यहाँ समझ नहीं आता—ना इसकी शुरुआत का पता है और ना ही अंत का। मनुष्य को चाहिए कि वह ‘वैराग्य’ (मोह-माया से दूरी) रूपी मजबूत हथियार से इस पेड़ की जड़ों को काट दे। इसके बाद उसे उस परम-पिता परमात्मा की खोज करनी चाहिए, जहाँ जाने के बाद मनुष्य कभी लौटकर इस संसार में जन्म नहीं लेता।
भावार्थ (५): जो लोग अहंकार और मोह से मुक्त हैं, जिन्होंने आसक्ति (लगाव) को जीत लिया है, जिनकी सभी सांसारिक इच्छाएं खत्म हो चुकी हैं और जो सुख-दुख के भेदों से आज़ाद हैं, वे ज्ञानी मनुष्य ही उस अविनाशी परम धाम को प्राप्त करते हैं।
भावार्थ (६): मेरे उस परम धाम को प्रकाशित करने के लिए न सूरज की जरूरत है, न चाँद की और न ही आग की। जो भी वहां एक बार पहुंच जाता है, वह इस संसार में वापस लौटकर नहीं आता; वही मेरा परम धाम है।
भावार्थ (७): इस संसार में हर जीव मेरा ही सनातन अंश है। लेकिन वह प्रकृति के प्रभाव में आकर मन और पांचों इंद्रियों के जाल में उलझकर संघर्ष करता रहता है।
भावार्थ (८): जैसे हवा फूलों से उनकी खुशबू चुरा कर अपने साथ ले जाती है, ठीक वैसे ही जीवात्मा जब एक पुराना शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करती है, तो वह अपने साथ पुराने शरीर के मन और इंद्रियों के संस्कारों को ले जाती है।
भावार्थ (९): यह आत्मा नया शरीर पाकर कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक और मन का सहारा लेती है और इन्हीं के माध्यम से सांसारिक सुखों और विषयों का भोग करती है।
भावार्थ (१०): अज्ञानी लोग आत्मा को शरीर छोड़ते हुए, शरीर में रहते हुए या विषयों का भोग करते हुए नहीं देख पाते। केवल ज्ञान रूपी आँखों वाले विवेकी पुरुष ही इस सत्य को देख और समझ पाते हैं।
भावार्थ (११): ध्यान और प्रयास करने वाले योगी इस आत्मा को अपने भीतर ही देख लेते हैं। लेकिन जिन्होंने अपने अंतर्मन को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानी लोग चाहे जितनी भी कोशिश कर लें, वे इसे नहीं देख पाते।
भावार्थ (१२): जो प्रकाश सूरज में है और पूरे ब्रह्मांड को रोशन करता है, और जो प्रकाश चाँद और आग में मौजूद है—उस सबको तुम मेरा ही प्रकाश समझो।
भावार्थ (१३): मैं ही अपनी शक्ति से इस पृथ्वी में प्रवेश करके सभी प्राणियों को धारण करता हूँ। और मैं ही अमृतमय चंद्रमा बनकर पृथ्वी की सभी वनस्पतियों और औषधियों को पोषण देता हूँ।
भावार्थ (१४): मैं ही सभी प्राणियों के पेट में जठराग्नि (पाचन की आग) के रूप में रहता हूँ, और प्राण-अपान वायु के साथ मिलकर उनके द्वारा खाए गए चार प्रकार के भोजन को पचाता हूँ।
भावार्थ (१५): मैं ही सभी प्राणियों के हृदय में बसा हूँ। मुझसे ही याददाश्त, ज्ञान और भूलने की शक्ति आती है। सभी वेदों के द्वारा जानने योग्य केवल मैं ही हूँ। मैं ही वेदांत का रचयिता और वेदों का असली जानकार हूँ।
भावार्थ (१६): इस संसार में दो प्रकार के पुरुष (अस्तित्व) हैं—पहला ‘क्षर’ (नाशवान) और दूसरा ‘अक्षर’ (अविनाशी)। सभी प्राणियों के शरीर नाशवान हैं, जबकि जीवात्मा को अविनाशी कहा गया है।
भावार्थ (१७): लेकिन इन दोनों (क्षर और अक्षर) से उत्तम एक और पुरुष है जिसे ‘परमात्मा’ कहा जाता है। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके सभी का पालन-पोषण करता है।
भावार्थ (१८): क्योंकि मैं नाशवान शरीरों से परे हूँ और अविनाशी आत्मा से भी श्रेष्ठ हूँ, इसीलिए मुझे दुनिया और वेदों में ‘पुरुषोत्तम’ (सबसे उत्तम पुरुष) के नाम से जाना जाता है।
भावार्थ (१९): हे अर्जुन! जो ज्ञानी मनुष्य बिना किसी संदेह के मुझे इस प्रकार ‘पुरुषोत्तम’ के रूप में जान लेता है, वह सब कुछ जानने वाला है और वह पूरी श्रद्धा और भाव से मेरी ही भक्ति करता है।
भावार्थ (२०): हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार मैंने तुम्हें यह सबसे गहरा और रहस्यमयी ज्ञान बता दिया है। जो व्यक्ति इस रहस्य को अच्छे से समझ लेता है, वह सच्चा बुद्धिमान बन जाता है और उसके जीवन के सभी लक्ष्य पूरे हो जाते हैं।
कृष्ण
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