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अधिकमास (मलमास या पुरुषोत्तम मास) का संपूर्ण रहस्य: महत्व, कथा, नियम और महाउपाय

अधिकमास (Adhik Maas) 2026: संपूर्ण जानकारी, वैज्ञानिक आधार, पौराणिक कथा और नियम
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सनातन धर्म में समय की गणना अत्यंत वैज्ञानिक और सूक्ष्म तरीके से की गई है। इसी काल गणना का एक अद्भुत हिस्सा है अधिकमास (Adhik Maas)। इसे मलमास और पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है। हर 32 महीने, 16 दिन और 8 घटी के बाद पंचांग में एक ऐसा महीना आता है जिसमें सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती। यह समय आध्यात्मिक ऊर्जा को जाग्रत करने और आत्म-कल्याण के लिए सर्वोत्तम माना गया है। पंडितवर्स (PanditVerse) के इस विशेष लेख में हम अधिकमास के हर पहलू को विस्तार से समझेंगे।

अधिकमास क्यों आता है? (वैज्ञानिक और खगोलीय आधार)

हिंदू पंचांग मुख्य रूप से सूर्य और चंद्रमा की गति पर आधारित है। इसे समझने के लिए सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष की गणना को समझना आवश्यक है:

  • सूर्य वर्ष (Solar Year): सूर्य को 12 राशियों का चक्र पूरा करने में 365 दिन और लगभग 6 घंटे का समय लगता है।
  • चंद्र वर्ष (Lunar Year): चंद्रमा पर आधारित वर्ष 354 दिनों का होता है।

इस प्रकार, एक सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर आ जाता है। यह अंतर तीन वर्षों में बढ़कर लगभग 32 या 33 दिनों (एक पूर्ण मास) का हो जाता है। इसी अतिरिक्त समय को समायोजित (Adjust) करने और सूर्य-चंद्र वर्ष को सिंक (Sync) में रखने के लिए पंचांग में हर तीसरे वर्ष एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है, जिसे ‘अधिकमास’ कहते हैं। यदि यह समायोजन न किया जाए, तो हमारे व्रत-त्यौहार और ऋतुओं का चक्र पूरी तरह बिगड़ जाएगा।

मलमास से ‘पुरुषोत्तम मास’ बनने की पौराणिक कथा

अधिकमास के पीछे एक अत्यंत रोचक और भावपूर्ण पौराणिक कथा है। जब इस अतिरिक्त महीने की उत्पत्ति हुई, तो इसका कोई स्वामी नहीं था। सूर्य की संक्रांति न होने के कारण इसे अशुद्ध या ‘मलमास’ (मलिन मास) माना गया। देवता, पितर और मुनियों ने इसमें अपने कार्य बंद कर दिए। अपने इस तिरस्कार से दुखी होकर मलमास रोते हुए वैकुंठ लोक में भगवान विष्णु के पास पहुंचा।

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मलमास की व्यथा सुनकर भगवान विष्णु उसे अपने साथ गोलोक ले गए, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण विराजमान थे। श्रीकृष्ण ने मलमास को गले लगाया और कहा— “हे मलमास! आज से मैं तुम्हें अपना नाम ‘पुरुषोत्तम’ देता हूँ। अब से तुम पुरुषोत्तम मास कहलाओगे। मैं अपने सभी दिव्य गुण तुम्हें प्रदान करता हूँ। जो भी भक्त इस महीने में निष्काम भाव से मेरी भक्ति करेगा, स्नान-दान करेगा, उसे अन्य महीनों की तुलना में हजार गुना अधिक पुण्य प्राप्त होगा और वह सीधे मेरे गोलोक धाम को प्राप्त करेगा।”

अधिकमास (पुरुषोत्तम मास) में क्या-क्या करना चाहिए? (विस्तृत नियम)

अधिकमास कोई सामान्य समय नहीं है, यह तपस्या और दान का महा-पर्व है। स्कंद पुराण और पद्म पुराण के अनुसार इस मास में निम्नलिखित कार्य अवश्य करने चाहिए:

1. विशेष पूजा और पाठ

  • शालिग्राम और तुलसी पूजा: प्रतिदिन प्रातःकाल शालिग्राम जी को पंचामृत से स्नान कराएं और तुलसी पत्र अर्पित करें।
  • ग्रंथों का पठन: पूरे मास में श्रीमद्भागवत पुराण, गीता का 15वां अध्याय (पुरुषोत्तम योग), और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
  • दीपदान: इस महीने दीपदान का सबसे अधिक महत्व है। मंदिरों में, नदी के घाट पर, तुलसी के पास और आंवले के पेड़ के नीचे घी या तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए।

2. दान और महादान (33 का महत्व)

पुरुषोत्तम मास में ’33’ की संख्या का बहुत महत्व है। इस महीने में 33 देवताओं का आह्वान किया जाता है।

  • मालपुआ का दान: एक कांसे के बर्तन (थाली) में 33 मालपुए रखकर, उस पर गुड़ और घी रखकर ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को दान करने का विधान है। इसे महापुण्यदायी माना गया है।
  • अन्न और वस्त्र दान: गेहूं, चावल, चना, घी, वस्त्र, जूते और छाते का दान अपनी सामर्थ्य के अनुसार करें।
  • सुहाग सामग्री: सुहागिन महिलाओं को सुहाग की सामग्री दान करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

3. आहार और दिनचर्या (सात्विकता)

  • हविष्य अन्न का सेवन: व्रत करने वालों को सेंधा नमक, गाय का घी, दूध, दही, जीरा, और फलाहार ग्रहण करना चाहिए।
  • ब्रह्म मुहूर्त में स्नान: सूर्योदय से पूर्व उठकर तीर्थ जल या घर के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिए।
  • भूमि शयन और ब्रह्मचर्य: तपस्वियों की तरह आचरण करें, संभव हो तो भूमि पर शयन करें और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।

अधिकमास में क्या बिल्कुल नहीं करना चाहिए? (वर्जित कार्य)

चूँकि यह अतिरिक्त मास है, इसमें सांसारिक और सकाम कर्म फलित नहीं होते। इसलिए निम्नलिखित कार्यों को इस दौरान पूरी तरह से टाल देना चाहिए:

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1. मांगलिक और संस्कारिक कार्य (16 संस्कार)

  • विवाह और सगाई: विवाह, रोका, या सगाई तय करना या संपन्न करना वर्जित है।
  • उपनयन (जनेऊ) और मुंडन: बच्चों के मुंडन संस्कार, नामकरण, या विद्यारंभ संस्कार नहीं करने चाहिए।
  • कर्णवेध संस्कार: कान छिदवाने का कार्य भी मलमास में नहीं होता।

2. नए निर्माण और व्यावसायिक शुरुआत

  • गृह निर्माण व गृह प्रवेश: नए घर की नींव रखना (भूमि पूजन) या बनकर तैयार हुए घर में गृह प्रवेश करना पूरी तरह वर्जित है।
  • नया व्यापार: किसी नए बिजनेस की शुरुआत, नई दुकान का उद्घाटन या कोई बड़ी व्यावसायिक डील नहीं करनी चाहिए।
  • वाहन और संपत्ति: नई कार/बाइक खरीदना, नए प्लॉट या फ्लैट की रजिस्ट्री करवाना इस महीने में शुभ नहीं माना जाता।

3. आहार और आचरण में वर्जित चीजें

  • तामसिक आहार: मांस, मछली, अंडे, मदिरा (शराब), प्याज, और लहसुन का सेवन भूलकर भी न करें।
  • वर्जित सब्जियां और दालें: शास्त्रों के अनुसार मलमास में गाजर, मूली, बैंगन, मसूर की दाल, शहद, और बासी भोजन का त्याग करना चाहिए।
  • कठोर वचन और विवाद: किसी की निंदा करना, चुगली करना, अपशब्द बोलना और वाद-विवाद करना इस पवित्र मास के पुण्य को नष्ट कर देता है।

अधिकमास के अपवाद: क्या किए जा सकते हैं?

कई लोगों को यह भ्रम होता है कि अधिकमास में कुछ भी नहीं किया जा सकता। लेकिन कुछ विशेष कार्य इस महीने में किए जा सकते हैं:

  • नित्य कर्म: रोजमर्रा के कार्य, नित्य पूजा, और पूर्व से चले आ रहे व्रत (जैसे एकादशी) जारी रखे जा सकते हैं।
  • सीमान्त संस्कार: गर्भधारण से जुड़े कुछ आवश्यक संस्कार जो समय पर ही होने चाहिए, वे किए जा सकते हैं।
  • श्राद्ध: यदि किसी परिजन की मृत्यु इसी अधिकमास में हुई है, तो उनका श्राद्ध और अंतिम संस्कार के कार्य नियमानुसार किए जाते हैं (किंतु अष्टका श्राद्ध वर्जित है)।
  • रोग निवारण महामृत्युंजय जाप: यदि कोई अत्यंत बीमार है, तो उसके स्वास्थ्य लाभ के लिए महामृत्युंजय मंत्र या अन्य अनुष्ठान किए जा सकते हैं।

अधिकमास या पुरुषोत्तम मास, ईश्वर द्वारा मनुष्य को दिया गया एक ‘बोनस’ समय है। यह वह समय है जब हम दुनियादारी, शादियों, और भौतिक दौड़-भाग से ब्रेक लेकर केवल अपने आध्यात्मिक उत्थान पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। पंडितवर्स (PanditVerse) की सलाह है कि इस एक महीने को ईश्वर के चरणों में समर्पित करें। नाम जपें, दान करें और सात्विक जीवन जिएं। ऐसा करने से भगवान श्री हरि विष्णु की असीम कृपा प्राप्त होती है और जीवन के सभी कष्टों का निवारण होता है।


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