भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को भगवान गणेश का जन्मोत्सव गणेश चतुर्थी मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 27 अगस्त 2025, बुधवार को आएगा। गणेश जी को विघ्नहर्ता, बुद्धि के दाता और नई शुरुआत के देवता माना जाता है। यही कारण है कि किसी भी शुभ कार्य से पहले उनकी पूजा करना सनातन परंपरा का अभिन्न हिस्सा है।
गणेश की उत्पत्ति
शिवपुराण (रुद्रसंहिता, कुमारखण्ड) के अनुसार, एक बार माता पार्वती स्नान कर रही थीं। उन्होंने स्नान के समय प्रयुक्त उबटन से एक बालक की रचना की और उसमें प्राण फूँक दिए। यही बालक आगे चलकर गणेश कहलाए और पार्वती ने उन्हें अपने द्वारपाल के रूप में नियुक्त किया।
जब शिव जी लौटे और द्वार पर बालक ने उन्हें रोका तो क्रोधित शिव ने उसका मस्तक काट दिया। पार्वती के दुःख और क्रोध को शांत करने के लिए शिव ने हाथी का सिर उस बालक के धड़ पर स्थापित कर उसे पुनर्जीवित किया। तभी से वे “गजानन” कहलाए।
गणेश का स्वरूप और प्रतीक
भगवान गणेश का हर अंग गहरी आध्यात्मिक शिक्षा देता है:
- हाथी का सिर – बुद्धि, विवेक और स्मरण शक्ति का प्रतीक।
- बड़े कान – अधिक सुनने और कम बोलने की शिक्षा।
- सूंड – शक्ति और लचीलापन, हर परिस्थिति से जूझने की क्षमता।
- टूटा हुआ दांत (एकदंत) – ज्ञान के लिए त्याग, महाभारत लेखन की याद।
- चूहा (वाहन) – अहंकार पर नियंत्रण और छोटी से छोटी शक्ति का महत्त्व।
- गोल पेट (लम्बोदर) – संतोष, धैर्य और हर अनुभव को आत्मसात करने की क्षमता।
सनातन दृष्टि से गणेश
कुछ आधुनिक विद्वानों ने गणेश को “गैर-वैदिक” कहकर बौद्ध प्रभाव से जोड़ने की कोशिश की है, लेकिन यह दृष्टिकोण अधूरा है। सनातन परंपरा में गणेश वेदों और पुराणों दोनों में आदिकाल से निहित हैं। ऋग्वेद में “गणपति” और “ब्रह्मणस्पति” के रूप में उनका उल्लेख मिलता है। बौद्ध और जैन परंपराएँ भी सनातन की ही शाखाएँ हैं, इसलिए गणेश की उपस्थिति वहाँ मिलना सनातन धर्म के व्यापक प्रभाव का प्रमाण है, न कि किसी बाहरी उत्पत्ति का।
आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
गणेश को मूलाधार चक्र का अधिष्ठाता माना गया है। यह ऊर्जा केंद्र स्थिरता, जीवन की नींव और साधना की शुरुआत का प्रतीक है। वैदिक ज्योतिष में गणेश को केतु ग्रह से भी जोड़ा गया है, जो वैराग्य और मोक्ष का द्योतक है। गणेश पूजा से केतु के दुष्प्रभाव शांत होते हैं और साधक को बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
गणेश चतुर्थी का पुनर्जागरण
यद्यपि गणेश चतुर्थी का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में है, परंतु इसे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 19वीं सदी में नया स्वरूप दिया। उन्होंने इसे घरों तक सीमित पूजा से निकालकर सार्वजनिक उत्सव बनाया, ताकि ब्रिटिश शासन के समय भारतीय समाज एकजुट होकर अपनी सांस्कृतिक पहचान प्रकट कर सके।
आज का महत्व
आधुनिक समय में गणेश चतुर्थी केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। इको-फ्रेंडली मूर्तियाँ, सामूहिक उत्सव और भक्ति-गीत इस पर्व को और भी सार्थक बनाते हैं। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि विघ्न चाहे बाहर से हों या भीतर से, उनका नाश केवल बुद्धि, संतोष और श्रद्धा से ही संभव है।
निष्कर्ष
गणेश चतुर्थी 2025 केवल भगवान गणेश के जन्मोत्सव का पर्व नहीं है, बल्कि यह सनातन संस्कृति की गहराई और उसकी जीवंत परंपरा का उत्सव है। जब हम 27 अगस्त 2025 को गणेश चतुर्थी मनाएँगे, तो यह अवसर होगा अपनी आस्था को और दृढ़ करने का, अपने भीतर की बाधाओं को दूर करने का और जीवन में एक नई शुरुआत करने का।