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दीपावली 2026: धनतेरस से भाई दूज तक संपूर्ण जानकारी, तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और धार्मिक महत्व

Diwali 2026: Dates, Muhurat, Puja Vidhi & Complete Festival Guide
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दीपावली केवल एक रात दीप जलाने का पर्व नहीं है। यह वह समय है जब घरों के आँगन में दीपक सजते हैं, बाजारों में उत्सव का रंग उतर आता है, परिवार एक साथ पूजा करता है और सनातन परंपरा की अनेक कथाएँ जीवंत हो उठती हैं। धनतेरस से आरंभ होकर भाई दूज तक चलने वाला दीपोत्सव धन, आरोग्य, प्रकाश, अन्न, भक्ति और पारिवारिक प्रेम का एक सुंदर संगम है।

दीपावली के इन दिनों में भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी, भगवान गणेश, भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत और यम-यमुना की परंपराएँ अलग-अलग रूपों में सामने आती हैं। प्रत्येक पर्व का अपना विधान और संदेश है। कहीं आरोग्य की कामना है, कहीं अधर्म पर धर्म की विजय, कहीं प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और कहीं भाई-बहन के प्रेम का उत्सव।

वर्ष 2026 में दीपावली 8 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी। इस वर्ष नरक चतुर्दशी का अभ्यंग स्नान और दीपावली की लक्ष्मी पूजा एक ही दिन पड़ रहे हैं। गोवर्धन पूजा 10 नवंबर और भाई दूज 11 नवंबर को मनाई जाएगी। आइए, धनतेरस से भाई दूज तक दीपोत्सव के प्रत्येक पर्व की तिथि, शुभ मुहूर्त, कथा, महत्व और पूजा विधि को विस्तार से समझते हैं।

दीपावली 2026: धनतेरस से भाई दूज तक पर्व कैलेंडर

दीपावली के पर्व कार्तिक कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की आरंभिक तिथियों में मनाए जाते हैं। इनका निर्धारण चंद्र तिथि और संबंधित धार्मिक परंपराओं के आधार पर होता है।

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  • धनतेरस: 6 नवंबर 2026, शुक्रवार
  • काली चौदस: 7 नवंबर 2026, शनिवार की रात्रि
  • नरक चतुर्दशी / छोटी दिवाली: 8 नवंबर 2026, रविवार
  • दीपावली / लक्ष्मी पूजा: 8 नवंबर 2026, रविवार
  • गोवर्धन पूजा / अन्नकूट: 10 नवंबर 2026, मंगलवार
  • भाई दूज: 11 नवंबर 2026, बुधवार

विशेष: 2026 में अमावस्या तिथि 8 नवंबर के दिन प्रारंभ होकर 9 नवंबर दोपहर तक रहेगी। अमावस्या के प्रदोष काल में लक्ष्मी पूजा होने के कारण दीपावली 8 नवंबर को मनाई जाएगी। गोवर्धन पूजा के लिए प्रतिपदा तिथि का सूर्योदय पर होना महत्वपूर्ण है, इसलिए यह 10 नवंबर को पड़ेगी।

1. धनतेरस 2026: धन, आरोग्य और समृद्धि का पर्व

धनतेरस तिथि: 6 नवंबर 2026, शुक्रवार

पूजा मुहूर्त: शाम 6:03 बजे से 7:58 बजे तक (नई दिल्ली)

धनतेरस की पौराणिक कथा और भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य

धनतेरस को धनत्रयोदशी भी कहा जाता है। यह पर्व कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को मनाया जाता है और दीपावली उत्सव का आरंभ माना जाता है। इस दिन का संबंध भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की आराधना से है।

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समुद्र मंथन की प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का मंथन किया, तब अनेक दिव्य रत्नों के साथ भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए। उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का प्रवर्तक और देवताओं का वैद्य माना जाता है।

इसी कारण धनतेरस केवल धन-संपत्ति का पर्व नहीं, बल्कि आरोग्य और दीर्घायु की कामना का भी दिन है। भारतीय परंपरा में स्वास्थ्य को सबसे बड़ा धन माना गया है। धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा इस भाव को स्मरण कराती है कि समृद्धि का वास्तविक आधार स्वस्थ शरीर और संतुलित जीवन है।

धनतेरस पर खरीदारी क्यों की जाती है?

धनतेरस पर सोना, चाँदी, नए बर्तन और उपयोगी वस्तुएँ खरीदने की परंपरा है। अनेक परिवार इस दिन धातु के बर्तन, सिक्के या घर के लिए आवश्यक सामान खरीदते हैं। इसे शुभ आरंभ और समृद्धि के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

हालाँकि, धनतेरस का अर्थ केवल खरीदारी करना नहीं है। इस दिन घर की सफाई, दीपदान, आरोग्य की कामना और भगवान धन्वंतरि की पूजा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

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धनतेरस पूजा विधि

  1. घर की साफ-सफाई करके पूजा स्थान तैयार करें।
  2. भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर का स्मरण करें।
  3. दीपक, पुष्प, अक्षत, फल और मिठाई अर्पित करें।
  4. भगवान धन्वंतरि के मंत्र का जप करें।
  5. संध्या के समय घर के बाहर यमराज के लिए दीपदान करें।

भगवान धन्वंतरि मंत्र:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वंतरये अमृतकलश हस्ताय सर्वामय विनाशाय त्रैलोक्यनाथाय श्री महाविष्णवे नमः॥

धनतेरस पर यम दीपदान का महत्व

धनतेरस की संध्या पर दक्षिण दिशा में दीपदान करने की परंपरा भी प्रचलित है। इसे यम दीपदान कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दीपदान से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार की रक्षा के लिए यमराज से प्रार्थना की जाती है।

इस परंपरा में दीपक केवल प्रकाश का साधन नहीं, बल्कि जीवन की रक्षा और मंगल की प्रार्थना का प्रतीक बन जाता है।

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2. काली चौदस 2026: शक्ति और नकारात्मकता से मुक्ति की परंपरा

काली चौदस: 7 नवंबर 2026, शनिवार की रात्रि

काली चौदस मुख्य रूप से गुजरात और कुछ पश्चिमी भारतीय परंपराओं में विशेष रूप से मनाई जाती है। इसे नरक चतुर्दशी से संबंधित एक अलग धार्मिक observance के रूप में भी जाना जाता है। कुछ परंपराओं में इस रात्रि को माता काली या भैरव की आराधना के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

काली चौदस का भाव अंधकार, भय और नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करना है। माता काली का स्वरूप हमें यह समझाता है कि आध्यात्मिक शक्ति केवल कोमलता ही नहीं, बल्कि अधर्म और अन्याय का सामना करने का साहस भी है।

इस दिन कुछ क्षेत्रों में विशेष रात्रि पूजा, दीपदान और साधना की परंपरा है। तंत्र संबंधी साधनाएँ सामान्य गृहस्थ पूजा से भिन्न होती हैं, इसलिए उन्हें योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।

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3. नरक चतुर्दशी 2026: छोटी दिवाली और नरकासुर वध की कथा

नरक चतुर्दशी: 8 नवंबर 2026, रविवार

अभ्यंग स्नान मुहूर्त: सुबह 5:37 बजे से 6:38 बजे तक (नई दिल्ली)

नरकासुर कौन था?

नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली भी कहा जाता है। इस पर्व का संबंध भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध से है।

पौराणिक कथा के अनुसार, नरकासुर नामक असुर ने अपने अत्याचारों से देवताओं और अनेक प्राणियों को पीड़ित कर रखा था। उसने कई राजकुमारियों को बंदी बनाया और देवताओं के अधिकारों को चुनौती दी। अंततः भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ नरकासुर का वध किया और बंदी स्त्रियों को मुक्त कराया।

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नरकासुर के अंत को अधर्म और अत्याचार के विनाश के रूप में देखा जाता है। इसीलिए नरक चतुर्दशी पर प्रकाश, शुद्धि और आनंद का उत्सव मनाया जाता है।

अभ्यंग स्नान की परंपरा

नरक चतुर्दशी की सुबह सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करने की परंपरा है। इसमें शरीर पर तेल लगाकर स्नान किया जाता है। कई क्षेत्रों में उबटन, सुगंधित तेल और विशेष स्नान सामग्री का प्रयोग होता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह स्नान पापों और नकारात्मकता से मुक्ति का प्रतीक है। इसका आध्यात्मिक भाव है कि व्यक्ति अपने भीतर की अशुद्धियों, आलस्य और अहंकार को त्यागकर नए उत्साह के साथ जीवन की शुरुआत करे।

नरक चतुर्दशी की पूजा और परंपराएँ

  • प्रातःकाल अभ्यंग स्नान करें।
  • भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण और पूजन करें।
  • घर के द्वार पर दीपक जलाएँ।
  • परिवार के साथ मिठाइयाँ और प्रसाद बाँटें।
  • अत्यधिक शोर और प्रदूषण से बचते हुए उत्सव मनाएँ।

छोटी दिवाली हमें यह संदेश देती है कि वास्तविक विजय केवल बाहरी शत्रु पर नहीं, बल्कि अपने भीतर के क्रोध, लोभ और अहंकार पर भी प्राप्त करनी चाहिए।

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4. दीपावली 2026: माता लक्ष्मी के आगमन और प्रकाश का महापर्व

दीपावली: 8 नवंबर 2026, रविवार

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त: शाम 5:55 बजे से 7:51 बजे तक (नई दिल्ली)

प्रदोष काल: शाम 5:31 बजे से 8:09 बजे तक

अमावस्या तिथि: 8 नवंबर सुबह लगभग 11:27 बजे से 9 नवंबर दोपहर लगभग 12:31 बजे तक

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दीपावली का अर्थ क्या है?

दीपावली शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—दीप और आवली। दीप का अर्थ है प्रकाश और आवली का अर्थ है पंक्ति। अर्थात दीपावली का अर्थ है दीपों की पंक्ति।

कार्तिक अमावस्या की रात्रि में जब आकाश में चंद्रमा नहीं होता, तब घरों और मंदिरों में जलते दीपक अंधकार को प्रकाश से भर देते हैं। यही दीपावली का सबसे सुंदर प्रतीक है—अंधकार के बीच प्रकाश का प्रकट होना।

भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन की परंपरा

उत्तर भारत में दीपावली का संबंध भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने से विशेष रूप से जुड़ा है। रामायण की परंपरा के अनुसार, भगवान श्रीराम ने चौदह वर्ष का वनवास पूरा किया और रावण का वध करके माता सीता तथा लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे।

उनके आगमन पर अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर स्वागत किया। यह परंपरा दीपावली को धर्म, न्याय और मर्यादा की विजय का उत्सव बनाती है।

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हालाँकि, दीपावली की धार्मिक परंपराएँ केवल रामायण तक सीमित नहीं हैं। माता लक्ष्मी का प्राकट्य, भगवान विष्णु की आराधना और विभिन्न क्षेत्रीय मान्यताएँ भी इस पर्व को समृद्ध बनाती हैं।

दीपावली पर माता लक्ष्मी की पूजा क्यों होती है?

माता लक्ष्मी को धन, सौभाग्य, ऐश्वर्य और समृद्धि की देवी माना जाता है। समुद्र मंथन के समय माता लक्ष्मी के प्राकट्य की कथा दीपावली की पूजा से जुड़ी प्रमुख पौराणिक परंपराओं में से एक है।

दीपावली की रात्रि में माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। माता लक्ष्मी समृद्धि का प्रतीक हैं और भगवान गणेश बुद्धि, विवेक तथा विघ्नों के नाश के देवता हैं। इसलिए दोनों की संयुक्त पूजा धन के साथ विवेक और मंगल की कामना को व्यक्त करती है।

कुछ परंपराओं में माता सरस्वती और भगवान कुबेर की पूजा भी की जाती है। व्यापारी समुदाय में बहीखाता पूजन और नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत का विशेष महत्व है।

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दीपावली लक्ष्मी पूजा विधि

  1. पूजा से पहले घर और पूजा स्थान को स्वच्छ करें।
  2. पूजा स्थल पर माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  3. कलश स्थापित करके उसमें जल, अक्षत, सुपारी और आम्रपत्र रखें।
  4. भगवान गणेश का प्रथम पूजन करें।
  5. माता लक्ष्मी को पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य और मिठाई अर्पित करें।
  6. लक्ष्मी मंत्र का जप करें और परिवार के साथ आरती करें।
  7. घर के मुख्य द्वार, आँगन और पूजा स्थान पर दीपक जलाएँ।
  8. दान, प्रसाद वितरण और परिवार के साथ मंगल कामना करें।

माता लक्ष्मी का मंत्र

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः॥

दीपावली पर दीप जलाने का आध्यात्मिक अर्थ

दीपावली में दीपक जलाना केवल घर को सजाने का कार्य नहीं है। भारतीय दर्शन में प्रकाश ज्ञान, चेतना और विवेक का प्रतीक है। अंधकार अज्ञान और भ्रम का प्रतीक माना जाता है।

जब हम दीप जलाते हैं, तो यह संकल्प भी लेते हैं कि अपने जीवन में सत्य, करुणा और सदाचार का प्रकाश बनाए रखें। दीपावली का वास्तविक संदेश केवल बाहर दीप जलाना नहीं, बल्कि भीतर के अंधकार को दूर करना भी है।

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5. गोवर्धन पूजा 2026: भगवान श्रीकृष्ण और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता

गोवर्धन पूजा: 10 नवंबर 2026, मंगलवार

प्रातः पूजा मुहूर्त: सुबह 6:40 बजे से 8:50 बजे तक (नई दिल्ली)

अपराह्न पूजा मुहूर्त: दोपहर 3:20 बजे से शाम 5:30 बजे तक (नई दिल्ली)

गोवर्धन पर्वत की कथा

गोवर्धन पूजा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की उस लीला से है जिसमें उन्होंने ब्रजवासियों को इंद्र के अहंकार से बचाया था।

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भागवत पुराण के अनुसार, ब्रजवासी वर्षा और कृषि के लिए इंद्र की पूजा करते थे। बालक कृष्ण ने उन्हें समझाया कि उनके जीवन का आधार गोवर्धन पर्वत, गौवंश और प्रकृति है। इसलिए उन्हें प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए।

ब्रजवासियों ने कृष्ण के कहने पर गोवर्धन पर्वत की पूजा की। इससे क्रोधित होकर इंद्र ने मूसलाधार वर्षा की। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों को आश्रय दिया।

अंततः इंद्र को अपने अहंकार का बोध हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण की महिमा स्वीकार की।

गोवर्धन पूजा का संदेश

गोवर्धन पूजा हमें प्रकृति, गौवंश, अन्न और पर्यावरण के प्रति कृतज्ञता का भाव सिखाती है। भगवान श्रीकृष्ण की यह लीला बताती है कि प्रकृति की रक्षा और उसके प्रति सम्मान ही जीवन का आधार है।

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यह पर्व अहंकार के त्याग और सामूहिक सहयोग का भी प्रतीक है। गोवर्धन पर्वत के नीचे सभी ब्रजवासी एक साथ सुरक्षित हुए थे। इस प्रकार यह लीला समाज में एकता और संरक्षण का संदेश देती है।

गोवर्धन पूजा और अन्नकूट

गोवर्धन पूजा के दिन अन्नकूट बनाने की परंपरा है। अन्नकूट का अर्थ है अनेक प्रकार के अन्न और व्यंजनों का समूह। मंदिरों में भगवान को विभिन्न प्रकार के भोजन अर्पित किए जाते हैं।

इस परंपरा में भगवान को अन्न का भोग लगाकर प्रसाद के रूप में भक्तों में वितरित किया जाता है। यह अन्न के प्रति सम्मान, भोजन की महत्ता और सामुदायिक सहभागिता का प्रतीक है।

गोवर्धन पूजा विधि

  1. घर या मंदिर में गोबर अथवा मिट्टी से गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाएँ।
  2. उस पर पुष्प, अक्षत और दीपक अर्पित करें।
  3. भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करें।
  4. अन्नकूट और विभिन्न व्यंजनों का भोग लगाएँ।
  5. गोवर्धन की परिक्रमा करें, जहाँ परंपरा प्रचलित हो।
  6. प्रसाद वितरित करें और गौसेवा तथा अन्नदान का संकल्प लें।

6. भाई दूज 2026: भाई-बहन के प्रेम और मंगल कामना का पर्व

भाई दूज: 11 नवंबर 2026, बुधवार

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तिलक मुहूर्त: दोपहर 1:10 बजे से 3:20 बजे तक (नई दिल्ली)

यम और यमुना की कथा

भाई दूज को यम द्वितीया भी कहा जाता है। इस पर्व का संबंध भगवान यमराज और उनकी बहन यमुना से है।

पौराणिक कथा के अनुसार, यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर आमंत्रित किया और उनका आदर-सत्कार किया। यमराज अपनी बहन के प्रेम से प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया कि जो भाई इस दिन अपनी बहन के घर जाकर उसके हाथों से भोजन करेगा तथा उसका स्नेह प्राप्त करेगा, उसे मंगल और दीर्घायु की कामना का आशीर्वाद मिलेगा।

इसी परंपरा के आधार पर भाई दूज का पर्व मनाया जाता है। बहन अपने भाई के माथे पर तिलक लगाती है, उसकी मंगल कामना करती है और भाई बहन को उपहार देकर उसके प्रति प्रेम तथा सम्मान व्यक्त करता है।

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भाई दूज की पूजा विधि

  1. बहन पूजा की थाली तैयार करती है जिसमें रोली, अक्षत, दीपक, मिठाई और पुष्प होते हैं।
  2. भाई को शुभ स्थान पर बैठाकर उसके माथे पर तिलक लगाया जाता है।
  3. भाई की आरती करके उसके मंगल और दीर्घायु की कामना की जाती है।
  4. भाई को मिठाई या भोजन कराया जाता है।
  5. भाई अपनी बहन को उपहार देकर उसके प्रति प्रेम और सम्मान व्यक्त करता है।

भाई दूज का महत्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह रिश्तों में प्रेम, सुरक्षा, सम्मान और पारिवारिक एकता को मजबूत करने का अवसर है।

दीपावली के पाँच प्रमुख पर्वों का आध्यात्मिक संदेश

धनतेरस से भाई दूज तक चलने वाला दीपोत्सव जीवन के अनेक पक्षों को एक साथ जोड़ता है। प्रत्येक पर्व का अपना आध्यात्मिक संदेश है।

  • धनतेरस: स्वास्थ्य और समृद्धि का सम्मान।
  • नरक चतुर्दशी: अधर्म और नकारात्मकता पर विजय।
  • दीपावली: अंधकार से प्रकाश और अज्ञान से ज्ञान की ओर यात्रा।
  • गोवर्धन पूजा: प्रकृति, अन्न और गौवंश के प्रति कृतज्ञता।
  • भाई दूज: परिवार, प्रेम और संबंधों का सम्मान।

दीपावली पर क्या करें और किन बातों का ध्यान रखें?

  • घर और पूजा स्थान की स्वच्छता बनाए रखें।
  • पूजा में श्रद्धा, शुद्धता और सरलता को महत्व दें।
  • माता लक्ष्मी की पूजा के साथ भगवान गणेश का पूजन करें।
  • दीपक सुरक्षित स्थान पर जलाएँ और बच्चों को अग्नि से दूर रखें।
  • अत्यधिक पटाखों से बचें तथा पर्यावरण और पशुओं का ध्यान रखें।
  • जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या उपयोगी सामग्री का दान करें।
  • परिवार और समाज में प्रेम, सद्भाव तथा सहयोग का भाव बनाए रखें।

दीपावली 2026: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दीपावली 2026 कब है?

दीपावली 8 नवंबर 2026, रविवार को मनाई जाएगी।

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धनतेरस 2026 कब है?

धनतेरस 6 नवंबर 2026, शुक्रवार को है।

छोटी दिवाली 2026 कब है?

नरक चतुर्दशी अथवा छोटी दिवाली का अभ्यंग स्नान 8 नवंबर 2026 की सुबह होगा। काली चौदस की रात्रि परंपरा 7 नवंबर को पड़ती है।

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दीपावली 2026 में लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?

नई दिल्ली के अनुसार लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त 8 नवंबर 2026 को शाम 5:55 बजे से 7:51 बजे तक है। स्थानीय पंचांग के अनुसार समय अलग हो सकता है।

गोवर्धन पूजा 2026 कब है?

गोवर्धन पूजा 10 नवंबर 2026, मंगलवार को मनाई जाएगी।

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भाई दूज 2026 कब है?

भाई दूज 11 नवंबर 2026, बुधवार को मनाई जाएगी।

दीपावली का वास्तविक प्रकाश हमारे भीतर भी जागे

दीपावली के दीप हमें याद दिलाते हैं कि प्रकाश केवल घरों और मंदिरों को ही नहीं, बल्कि मनुष्य के विचारों और व्यवहार को भी प्रकाशित करना चाहिए। धनतेरस हमें आरोग्य का मूल्य समझाती है, नरक चतुर्दशी अधर्म पर विजय का संदेश देती है, लक्ष्मी पूजा विवेकपूर्ण समृद्धि की कामना करती है, गोवर्धन पूजा प्रकृति के प्रति कृतज्ञ बनाती है और भाई दूज रिश्तों में प्रेम बनाए रखने की प्रेरणा देती है।

जब दीपावली का उत्सव इन भावों के साथ मनाया जाता है, तब यह केवल एक पर्व नहीं रहता, बल्कि जीवन को बेहतर बनाने का संकल्प बन जाता है।

आप सभी को धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज की हार्दिक शुभकामनाएँ। माता लक्ष्मी और भगवान श्री गणेश आपके जीवन में सुख, शांति, आरोग्य, विवेक और समृद्धि प्रदान करें। शुभ दीपावली!

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